Friday, March 21, 2025

खैर खून खाँसी खुशी बैर प्रीत मधुपान

बेचारे जज को क्या मालूम था कि होली के दिन उनके आवास में लगी आग उनके लिये मुसीबत का पहाड़ बन जाएगी. सोच रहे होंगे कि कितना अच्छा रहता जो सब कुछ जल कर राख हो गया होता. पर जज का आवास और उसमें लगी आग बुझाने के लिये दमकल कर्मी तुरंत पहुँच गये. आग बुझाने के दौरान उन्होने देखा कि नोटो का अम्बार लगा हुआ है. उन लोगों ने आग तो बुझा दी पर अब जो आग लगी है उसे बुझाने में जजों के कॉलेजियम के सामने समस्या खड़ी हो गई है.

रहीम का एक दोहा है -

खैर खून खाँसी खुशी बैर प्रीत मधुपान
रहिमन दाबे ना दबे जाने सकल जहान.

इस दोहा में रहीम कहते हैं कि सारी दुनिया जानती है कि खैर (कत्थे का दाग़), ख़ून, खाँसी, ख़ुशी, दुश्मनी, प्रेम और शराब का नशा; ये चीज़ें ना तो दबाने से दबती हैं और ना छिपाने से छिपती हैं. जज साहब के आवास पर लगी आग ने इस सच्चाई को रेखांकित कर दिया है.

दुनिया में भारत एक मात्र देश है जहाँ के जज खुद ही जज नियुक्त करते हैं, खुद ही उनकी सेवा शर्ते निर्धारित करते हैं, खुद ही पद स्थापन और स्थानान्तरण के खेल भी खेलते है. कहने के लिये तो हर नियुक्ति, पद स्थापन, स्थानान्तरण वगैरह के लिये देश के राष्ट्रपति की स्वीकृति जरुरी होती है पर यह एक नंगी सचाई है कि राष्ट्रपति भवन इन मामलों में सिर्फ विलम्ब कर सकता है, पुनर्विचार के लिये भेज सकता है, पर अन्तोगत्वा होता वही है जो इस देश के स्वंयभू जज चाहते हैं. उनके उपर न तो नैतिकता का कोई बन्धन होता है, न संविधान सम्मत होने की मजबूरी. हमारे देश के जज जो चाहें तय कर सकते हैं. संविधान में जो लिखा है उसकी मनमाफिक व्याख्या कर सकते हैं. जो नहीं लिखा है उसे भी संविधान की मूलभूत संरचना बता सकते हैं. वे चाहें जिस पर सवाल उठा लें पर उन पर सवाल उठाने का अधिकार या स्वतंत्रता किसी को नहीं है.

जब जज के आवास में इतनी बड़ी धनराशि मिली तो स्वाभाविक न्याय कहता है कि वह जज इस नगदी का स्रोत बताए, इसे नगदी के रूप में रखने का कारण बताये. जरा भी लाज हया होती तो ऐसा जज पहले त्यागपत्र दे देता और फिर न्याय पाने का विधि सम्मत तरीका तलाशता. आखिर कॉलेजियम में तो उसी के भाई बन्धु हैं. कोई न कोई तरीका निकाल ही लेंगे. पर किसी जज से ऐसी नैतिकता की उम्मीद रखना व्यर्थ है.

हाँ पर अब विधायिका अपने छीने जा चुके अधिकारों की पुनर्प्राप्ति के लिये प्रयास करने का बहाना पा गयी है. जजों से भी उन्हीं कानूनों के तहत निपटा जाना चाहिये जिन कानूनों के तहत वे आम नागरिकों को निपटाते रहते है.  पर अपने देश की न्यायापालिका से ऐसे न्याय की अपेक्षा रखना भी उनके प्रति अन्याय होगा.

Monday, January 6, 2025

सतसईया के दोहरे अरु नावक के तीर

सतसईया के दोहरे अरु नावक के तीर
देखन में छोटन लगें, घाव करें गंभीर।


यह दोहा सबको याद होगा. आजकल चुनावों में इसी तरह छोटे-छोटे मगर गंभीर असर दिखाने वाले बयानों का जमाना आ गया है. हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान तीन शब्दों के एक मारक वाक्य ने देश की राजनीतिक दिशा बदल कर रख दी. "बंटेगें तो कटेगें" वाला एक ही नारा चुनाव परिणामों को अप्रत्याशित रुप से प्रभावित कर गया. इसी वाक्य का परिमार्जित रूप "एक हैं तो सेफ हैं" भी प्रभावशाली रहा पर जनमानस पर उसकी पकड़ "बंटेगें तो कटेगें" वाले नारे का मुकाबला नहीं कर पाया.

अब दिल्ली के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में एक शब्द का प्रयोग कर के आआपा वालों के लिये मुश्किल पैदा कर दी है. इन लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एएपी का हिन्दी रुप "आप" चला कर वे ऐसा कर देगें कि लोग आप शब्द का प्रयोग करना तक भूल जाएंगे. जैसे आजकल किसी को आप पप्पू कह दें तो वह आपको बहुआयामी गालियों से आह्लादित कर देगा. एक जमाने में लोग अपने बच्चों को मुन्ना, पप्पू वगैरह बुलाया करते थे. पर आज शायद ही कोई बाप या माँ अपने बच्चे को पप्पू कह कर बुलाते होंगे. सर्वनाम जब संज्ञा बन जाये तो ऐसा ही होता है. महात्मा और पंडित कहलाने वाले लोगों ने इन आदरणीय शब्दों की छवि खराब कर दी है पर फिर भी महात्मा और पंडित आम प्रयोग में मिल जाते हैं. मगर पप्पू अभी कुछ सालों तक वर्जित शब्दों की श्रेणी में ही बना रहेगा.

पीएम मोदी ने आआपा वालों को दिल्ली के लिए 'आप'दा विशेषण से सुशोभित कर के बहुत ही मारक प्रभाव पैदा कर दिया है. और इस घातक प्रहार की काट आआपा वाले अब तक नहीं निकाल पाये हैं. हालांकि पता नहीं यह शब्द सहज भाव से मोदी जी के भाषण में आ गया या इसे किसी अदृश्य लेखक ने लिखा. साल 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान इसी तरह पीएम  मोदी ने सपा के "कारनामा" का जिक्र कर के मारक प्रभाव पैदा कर दिया था कि सपा वालों का काम नहीं बोलता, इनका "कारनामा" सब कुछ बयान कर देता है. इन्दिरा जी के जमाने में "ये कहते हैं इन्दिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ' के नारे ने ऐसा ही प्रभाव पैदा किया था. आल इन्दिरा रेडियो भी ऐसा प्रभाव पैदा नहीं कर पाया था न ही "इन्दिरा इज इण्डिया एण्ड इण्डिया इज इन्दिरा" वाला बयान तो कांग्रेस की आलोचना करने के काम आ गया था.

आशा करता हूं कि बाकी राजनीतिक दल भी  इसी तरह के चुटीले तीरों का प्रयोग कर हमारा मनोरंजन भी करेंगे और अपनी लक्ष्यप्राप्ति का प्रयास भी.

Saturday, December 28, 2024

सिक्खों के हत्यारे आज सिक्ख सम्मान की बात कर रहे

 

सिक्खों के हत्यारे आज सिक्ख सम्मान की बात कर रहे


दस बरसों तक कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी के इशारों पर काम करने वाले देश के एक्सीडेन्टल प्रधान मंत्री पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निधन 92 वर्ष की उम्र में 26 दिसंबर 2024 की रात करीब 9 बजे हृदयाघात के कारण हो गया. उनके निधन के बाद शोक की घड़ी में कांग्रेस और उसके दल्लों ने अलग ही राजनीति शुरु कर दी.

जिस कांग्रेस पर साल 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हजारों सिक्खों की नृशास हत्या का आरोप लगा आज वही कांग्रेस सिक्ख सम्मान की बात कर रही है. जिस कांग्रेस की अध्यक्षा ने उनको कभी यथोचित सम्मान नहीं दिया आज वह कांग्रेस दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री और सिक्ख समुदाय के सम्मान की बात कर रही है.

जिस कांग्रेस ने अपने ही दल से पूर्व प्रधानमंत्री रहे पामुलापति वेंकट नरसिंह राव (जन्म- 28 जून 1921, मृत्यु- 23 दिसम्बर 2004) के पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय में घुसने भी नहीं दिया, उनके अंतिम संस्कार के दिल्ली में कराने की अनुमति नहीं दी, उनका कोई स्मारक नहीं बनने दिया वही कांग्रेस आज एक पूर्व प्रधानमंत्री के सम्मान की बात कर रही है. शायद कांग्रेस को लगता है कि देश की जनता भूल जाती है. और उसे याद नहीं होगा कि स्व. नरसिंह राव के निधन के बाद उनके साथ कैसा व्यवहार जब मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री थे और सोनिया गाँधी कांग्रेस की अध्यक्षा.

बेशर्मों की तरह खुद को भारत रत्न से सम्मानित करवाने वाले नेहरू परिवार के दल्लों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है. पर देश इस विंडम्बना को भौंचक भाव से देख रहा है.

मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार में निगमबोध घाट पर राजकीय सम्मान के साथ किया गया. अंतिम संस्कार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, भूटान नरेश जिग्मे खेसर नमगायेल वांगचुक, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू, भाजपा अध्यक्ष तथा केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा, दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, तीनों सेनाओं के प्रमुखों के साथ ही कई केंद्रीय मंत्री, राजनयिक तथा अन्य गणमान्य लोग शामिल हुए.

Wednesday, November 28, 2012

लोग कहते हैं कि कुत्ता कुत्ते का माँस नहीं खाता

पता नहीं यह सच है या नहीं मगर कम से कम आदमी की नस्ल में ऐसा नहीं होता. खास कर नेता और पत्रकार बिरादरी में. इन बिरादरीओं में बस मौका मिलना चाहिए और फिर एक दूसरे का माँस नोचने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं होती.

आजकल पत्रकार बिरादरी बहुत उत्साह में है. उसे अपनी बिरादरी की दो लाशे मिल गई हैं और वे जम कर उसका भोज खाने में लग गए हैं. भूल गए हैं कि अगर मीडीया का समूह बना रहा तो सरकार को बहुत दिक्कत होती है उससे निबटने में. कोई ना कोई कहीं ना कहीं नेशनल हेराल्ड जैसे मुद्दों को छाप ही देता है दिखा ही देता है. सो अगर इनसे एक एक कर निबटा जाए तो सरकार एक दिन पूरी मीडिया को अपना दास बना ही लेगी. पुराने लोगों को याद होगा कि किस तरह आपातकाल के दौरान जिनको झुकने के लिए कहा गया था वे रेंगने लगे थे. और मीडिया कि तोड़ने के लिए सबसे आसान तरीका है एक को दूसरे से लड़ा देना.

आज वही हो रहा है. अपनी सिद्धान्तप्रियता जताने के लिए लोग एक से बढ़ कर एक तरीके से उन दोनो पत्रकारों को दोषी ठहराने में लगे हुए हैं. इस बीच किसी को याद नहीं कि इस पूरे प्रकरण में एक पक्ष और है. उसी पक्ष का घोटाला दिखाने या न दिखाने के लिए यह सारा प्रकरण बना. मगर लगभग पूरी की पूरी पत्रकार बिरादरी भिड़ गई है सिर्फ और सिर्फ एक पक्ष को दोषी दिखलाने में. क्या इससे यह नहीं लगता कि चाटुकारों की पूरी फौज बन गई है मीडिया में. जो राबर्ट और राहुल सोनिया पर लगे आरोपों की एकाध झलक दिखा कर लीपापोती कर लेते हैं मगर गडकरी के खिलाफ रोजाना माहौल बनाए रखते हैं.

पत्रकार अपने भीतर जितनी नंगई पाले हुए हो मगर अपनी बकतूतो में वो उसे बाहर नहीं आने देता या नहीं चाहता. यह काम उसके विरोधियों पर रह जाता है. आजु पूरी कोशिश हो रही है कि इस मसले को मीडिया बनाम सरकार का न बनने दिया जाए और इसे दो तथाकथित ब्लैकमेलर पत्रकारों का सीमित मसला बना कर रख दिया जाय.

दुर्भाग्य से यह कोशिश सफल भी होती दिख रही है.

Tuesday, November 27, 2012

सत्ता सुख के लिए कुछ भी करेगें

FDI के मुद्दे पर अलग अलग पार्टियों ने जो रूख दिखलाया है वह यही बताता है कि ये पार्टियाँ अपने राजनीतिक फायदे के लिए कुछ भी कर सकती है. और अपनी हर बात को सही दिखलाने के लिए उनके पास हमेशा भाजपा का बहाना मौजूद रहता है.उनका मानना है कि देश जाए चूल्हे भाँड़ में, पर भाजपा को सत्ता में नहीं आने देंगे.

इधर भाजपा को देख के लगता है कि उसे दुश्मनों की जरूरत ही नहीं है. अपना सत्यानाश करने के लिए बह खुद काफी है. हाल फिलहाल गडकरी ने जो नुकसान भाजपा का कराया है उसकी भरपाई शायद ही हो पाए. चाल चरित्र चेहरा का दावा करने वाली पार्टी ने गडकरी के मामले में शुतुर्मुर्गी नजरिया अपना लिया है. शायद यह संघ के स्वाभिमान को बचाने के नाम पर हो रहा है. गलती हर किसी से हो सकती है. अगर गडकरी को भाजपा अध्यक्ष बनाते वक्त कुछ जानकारिया जगजाहिर नहीं थी तो जगजाहिर होने के बाद अपना फैसला बदल लेना बुद्धिमानी की बात होती. मगर जानते हुए भी कि गलत हो गया है उस फैसले से चिपके रहना सही नहीं.

ऐसा भी नहीं है कि राम जेठमलानी जो कर रहे है वो सही है, या यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा की बाते जायज हैं. कुछ बाते पार्टी फोरम के भीतर ही होनी चाहिए अगर आपका मकसद पार्टी कि होने वाले नुकसान से बचाना है. मगर यहाँ तो लगता है कि पार्टी के हर फैसले को, नेतृत्व को अपने निजी पूर्वग्रहों के चलते गरियाते रहने की आदत बना ली गई है. पता नहीं किस सोच ने जेठमलानी या शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोगों को भाजपा में शामिल कराया.

सपा और बसपा अपनी अपनी मजबूरियों के चलते यूपीए के साथ चिपकी हुई हैं. बसपा को एससी एसटी के लिए प्रोन्नतियों में आरक्षण बहाल कराना जरूरी लगता है तो सपा को इसका विरोध करना. बावजूद इसके दोनों यूपीए के साथ हैं और अपनी अपनी बात मनवाने के लिए वे किसी भी हद तक जाने का दावा भी कर रहीं हैं. यहाँ भी देशहित की चिन्ता नहीं अपने राजनीतिक हितों की चिन्ता अधिक है.

तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी का आचरण तो और गजब का है. कब क्या फैसला कर लेगीं कोई नहीं जानता. चूंकि भाजपा और लेफ्ट ने उनके अविश्वास प्रस्ताव का साथ नहीं दिया सो वे इन पार्टियों के मत विभाजन कराने की माँग का समर्थन नहीं करेगीं.

हालात ऐसे बन गये हैं कि को बड़ छोट कहत अपराधू! ऐसे में आम जनता की जिम्मेदारी बनती है कि वो पार्टियों से उपर उठें और हर जगह उम्मीदवार को प्राथमिकता दें.